अच्छे रोल के लिए मैं कभी चमचागिरी नहीं करूंगा : परेश रावल

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता परेश रावल इन दिनों रिलीज के लिए तैयार फिल्म ‘संजू’ के प्रमोशन में जुटे हैं। इस मौके पर हमसे हुई बातचीत में अपनी फिल्म और किरदार के अलावा परेश रावल ने कई और सवालों के जवाब दिए।

  • किसी फिल्म का चुनाव कैसे करते हैं

सबसे पहले तो मैं फिल्म में अपना रोल देखता हूं। अगर रोल कुछ अतला-पतला (कमजोर) सा है,

तो फिर मैं डायरेक्टर देखता हूं क्योंकि मुझे लगता है अगर रोल ठीक-ठाक नहीं बल्कि कमजोर है तो अच्छा डायरेक्टर फिल्म को संभाल लेगा। अगर फिल्म का डायरेक्टर में भी दम नहीं है

तो फिर मैं पैसे देखता हूं, पैसे मिल रहे हैं तो पैसे ले लो और

अगर रोल, डायरेक्टर और पैसा यह तीनों चीज नहीं है तो फिर कोई बात नहीं बनती है।

  • ‘संजूू’ में सुनील दत्त की भूमिका निभाने के लिए किन बातों का सबसे ज्यादा ध्यान रखा था आपने?

सुनील दत्त को लेकर कभी भी कोई मैनरिजम नहीं रहा है। वह बहुत ही नॉर्मल इंसान थे

इसलिए दत्त साहब का किरदार मुश्किल भी था। ऐसे किरदारों में आप देखते हैं कि

आप जिसका रोल कर रहे हैं, वह किरदार किन-किन तकलीफों से गुजर रहा है।

मैंने दत्त साहब का रोल निभाने के लिए उनके संघर्ष और दर्द को पकडऩे की कोशिश की है।

  • फिल्म के बारे में

‘संजू’ बाप-बेटे के रिश्ते की कहानी है। एक तरफ जहां नरगिस जी की जानलेवा बीमारी की चिंता में दत्त साहब परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर बेटे के जानलेवा नशे की परेशानियां।

इन सबके बीच उनके राजनीतिक करियर को लेकर भी सवाल उठाए गए। यह सब खत्म नहीं हुआ और बम ब्लास्ट में बेटे का नाम आ जाना। जो परिवार सारी जिंदगी देश सेवा में काम कर रहा था,

उसी परिवार का एक बेटा देश सेवा के विरुद्ध काम में फंस गया था।

बम ब्लास्ट में बेटे का नाम आना परिवार पर क्या बीती होगी।

मैंने सुनील दत्त के इसी संघर्ष और दर्द को पकड़ कर किरदार में इसे दिखाने की कोशिश की है।

  • सुनील दत्त बनने के लिए मेरा फोकस उनका दर्द और संघर्ष था

इस तरह के रोल और फिल्म में जब एक आदमी संजय दत्त को हू-ब-हू निभा रहा है, तो दूसरा आदमी सुनील दत्त दिखेगा ही दिखेगा। सुनील दत्त बनने के लिए मेरा फोकस उनका दर्द और संघर्ष था।

यह बात भी सही है कि एक एक्टर जो किरदार निभा रहा है,

वह उसे पूरी तरह बनने की कोशिश करता रहे तो ज्यादा अच्छा होगा।

अब मैंने सुनील दत्त साहब को पूरी तरह ब्लू-प्रिंट तो नहीं किया है,

लेकिन मैं उनकी दरिया-दिली और उनके साधारण स्वभाव को धीरे-धीरे एक प्रॉसेस के साथ अपने अंदर लेकर आया था।

  • सब कुछ उथल-पुथल चल रहा था लेकिन दत्त साहब ने कभी अपना आपा नहीं खोया

जिंदगी में इतना सब कुछ उथल-पुथल चल रहा था, लेकिन दत्त साहब ने कभी अपना आपा नहीं खोया।

कभी किसी को गाली नहीं दी, कभी किसी को ब्लेम नहीं किया।

उन्होंने सिर्फ अपने बेटे को सुधारने की कोशिश की है। शायद उनका मानना था कि वह मान चुके थे कि यह उनका अपना संघर्ष है,

उन्हें अपने बेटे को खुद ही सही करना था। उन्होंने कभी भी अपने बेटे को यह नहीं कहा कि उसकी वजह से उनका पॉलिटिकल करियर खराब हो रहा है और लोग उन्हें गालियां दे रहे हैं।

जो भी बुरा उनके साथ हो रहा था या लोग जो बुरा कह रहे थे,

सब कुछ वह खुद पीते जा रहे थे। उनके व्यक्तित्व की यही सब चीजें थीं जो मेरे कैरेक्टर की रीड की हड्डी थी,

जो मुझे बाहर ले कर आना था और मैंने कोशिश की है कि मैं किरदार के साथ इंसाफ कर सकूं।

  • सुनील दत्त की सबसे बड़ी खासियत क्या थी?

सुनील दत्त की सबसे बड़ी खूबी थी कि इतना सब होने के बाउजूद कभी भी

उन्होंने अपने परिवार को तितर-बितर होने नहीं दिया।

दूसरा बेटे पर लगे बम ब्लास्ट और आतंकवाद के दाग से बेटे को कानून के हिसाब से बाहर निकालना।

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