आर्कटिक पर इस साल जमी सबसे कम बर्फ, ग्लोबल वार्मिग पर असर

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आर्कटिक। शीत ऋतु में आर्कटिक पर जमने वाली बर्फ मार्च महीने तक अपने अधिकतम स्तर पर होती है। इसके बाद बर्फ का पिघलना शुरू हो जाता है। इस साल आर्कटिक पर बर्फ का अधिकतम स्तर 39 वर्षों में दूसरा सबसे कम रहा। नासा ने एक रिपोर्ट में जानकारी दी है कि लगातार चार वर्षों से आर्कटिक पर सबसे कम क्षेत्रफल में बर्फ जम रही है। शीत ऋतु के आने में देरी और उसमें भी गर्म हवाएं चलने से ऐसा हुआ है। जलवायु, मौसम चक्र और जीव-जंतुओं के जीवन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड सकता है। लगातार सबसे कम बर्फ 2015, 2016, 2017 और अब 2018 में आर्कटिक में तकरीबन चार दशकों की सबसे कम बर्फ जमी है। इस शीत ऋतु में आर्कटिक के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री के पार पहुंचा है। ऐसा ही रहा तो आर्कटिक में जमी सबसे चौडी और सबसे पुरानी बर्फ कुछ ही दशकों में खत्म हो जाएगी। इसका असर ग्लोबल वार्मिग पर पड़ेगा। इस साल ग्रीष्म ऋतु के खत्म होने तक नई दरारें उभरने की आशंका है। जैसे-जैसे बर्फ की मोटाई कम होती जाएगी, ग्रीष्म ऋतु में बर्फ पिघलने की गति तेज होती जाएगी।

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