एसएमएस मेडिकल कॉलेज में अटका स्किन बैंक बनने का मामला

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महानगर संवाददाता
बर्न मरीजों को त्वचा मिलने में आ रही समस्या, सरकारी स्तर पर नहीं हो रहे कोई प्रयास
जयपुर। एसएमएस मेडिकल कॉलेज में बर्न मरीजों के लिए बनने वाले स्किन बैंक का मामला अभी भी अटका हुआ है। ऐसे मे एसएमएस अस्पताल में स्किन बैंक नहीं बन पा रहा है। स्किन बैंक नहीं बन पाने के कारण एसएमएस अस्पताल में आ रहे बर्न मरीजों को इलाज में समस्याएं भी आ रही हैं।

इस मामले मेंएसएमएस मेडिकल कॉलेज प्रशासन का कहना है कि कुछ समय पहले उनके पास एक निजी फाउंडेशन के सदस्य आए थे जो कि एसएमएस अस्पताल में स्किन बैंक बनाने के लिए रुचि ले रहे थे। जिसके चलते एसएमएस अस्पताल में स्किन बैंक लगभग तय हो गया था। लेकिन बाद में निजी संस्था के सदस्यों के पीछे हटने से एसएमएस में स्किन बैंक नहीं बन पाया। जो कि अभी अटका हुआ है।

बहरहाल वजह चाहे जो भी हो लेकिन स्किन बैंक बनने के बाद एसएमएस अस्पताल आ रहे बर्न मरीजों को राहत मिलती। लेकिन स्किन बैंक के नहीं बनने से बर्न मरीजों को इलाज के दौरान परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही इस योजना को पूरा करने के लिए सरकारी स्तर पर भी कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
निजी संस्था आई थी लेकिन
में बाद वह पीछे हट गई
एसएमएस मेडिकल कॉलेज में स्किन बैंक बनाने के लिए कुछ समय पहले एक निजी मोहन फाउंडेशन के सदस्य मेरे पास आए थे। लेकि न बाद में संस्था के सदस्य बाद में पीछे हट गए। इसके चलते स्किन बैंक नहीं बन पाया। सरकारी स्तर पर स्किन बैंक को बनाने के लिए अभी कोई योजना नहीं है।
-डॉ. यू. एस. अग्रवाल
प्राचार्य, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर
स्किन बैंक बनने के ये होते फायदे
जो भी व्यक्ति परिजन की मौत पर उसकी स्किन को डोनेट करना चाहता है वह अपने परिजन की स्किन बैंक में डोनेट कर सकता था। स्किन बैंक में महिलाएं, पुरुष और बच्चे की मौत होने के छह घंटे के अंदर शव से स्किन निकाली जा सकती है और उसे स्किन बैंक में सुरक्षित रखा जा सकता है। इस स्किन को 4 डिग्री तापमान में 5 वर्षों तक रखा जा सकता। इस दौरान जरूरत पडऩे पर इसका उपयोग सत्तर से अस्सी प्रतिशत तक जले हुए मरीजों पर किया जा सकता है।
इस डोनेट की गई स्किन को निकाले जाने से खून नहीं बहता और इस प्रक्रिया में शारीरिक विकृ ति भी नहीं होती। इस स्किन बैंक में कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को स्किन डोनेट कर सकता था। इसके लिए ब्लड व किडनी डोनेशन की तरह मैचिंग करनी नहीं पड़ती । बसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गंभीर रूप से जले हुए लोगों को जिनके बचने की उम्मीद लगभग नहीं रहती है उन्हें स्किन बैंक के सहारे नवजीवन मिलता और 60 से 70 प्रतिशत तक जले लोगों की जान भी उन्हें स्किन बैंक से स्किन उपलब्ध कराकर बचाई जा सकती ।

मरीजों की त्वचा का ही कर रहे उपयोग
एसएमएस अस्पताल के प्लास्टिक सर्जन डॉ. राकेश जैन का कहना है कि मृत व्यक्ति से ली गई त्वचा को रासायनिक रूप से उपचारित कर सुरक्षित रखा जा सकता है। यह जले हुए मरीजों को तात्कालिक रूप से काफ ी उपयोगी होती है । इस तरह ली गई त्वचा को जले हुए मरीज को लगाया जा सकता है और तीन से चार सप्ताह में जब उस मरीज की खुद की त्वचा आने लगेगी तो यह त्वचा अपने आप हटती जाती है। इस स्किन से मरीज को संक्रमण का खतरा नहीं रहता साथ ही मरीज के शरीर में प्रोटीन की कमी नहीं होती और कुछ दिन बाद मरीज की खुद की त्वचा भी जल्दी ही आ जाती है। चिकित्सकों के अनुसार अभी स्किन बैंक सिर्फ तीन शहरों मुंबई दिल्ली और कोच्ची में ही हैं। लेकिन राजस्थान में स्किन बैंक की सुविधा नहीं होने के कारण चिकित्सक मरीजों की ही त्वचा का उपयोग कर रहे हैं।

मरीजों की त्वचा का ही कर रहे उपयोग
एसएमएस अस्पताल के प्लास्टिक सर्जन डॉ. राकेश जैन का कहना है कि मृत व्यक्ति से ली गई त्वचा को रासायनिक रूप से उपचारित कर सुरक्षित रखा जा सकता है।
यह जले हुए मरीजों को तात्कालिक रूप से काफ ी उपयोगी होती है। इस तरह ली गई त्वचा को जले हुए मरीज को लगाया जा सकता है और तीन से चार सप्ताह में जब उस मरीज की खुद की त्वचा आने लगेगी तो यह त्वचा अपने आप हटती जाती है। इस स्किन से मरीज को संक्रमण का खतरा नहीं रहता साथ ही मरीज के शरीर में प्रोटीन की कमी नहीं होती और कुछ दिन बाद मरीज की खुद की त्वचा भी जल्दी ही आ जाती है। चिकित्सकों के अनुसार अभी स्किन बैंक सिर्फ तीन शहरों मुंबई दिल्ली और कोच्ची में ही हैं। लेकिन राजस्थान में स्किन बैंक की सुविधा नहीं होने के कारण चिकित्सक मरीजों की ही त्वचा का उपयोग कर रहे हैं।

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