चंबल नदी के कण-कण में घुला ‘जहर’, नहीं खुल रही प्रशासन की नींद

कोटा। शहर की जीवनदायिनी चंबल नदी आज पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी है।
इतना ही नहीं नदी के कतरे कतरे में जहर घुल गया है,
इसके बावजूद भी सरकार और स्थानीय प्रशासन की नींद नहीं खुल रही है।

चंबल नदी में करीब 53 से ज्यादा छोटे-बड़े गंदे नाले गिर रहे हैं, और

सैकड़ों जगह पर उस में गंदगी डाली जा रही है। इन गंदे नालों से चंबल नदी का पानी इतना प्रदूषित हो गया है कि नदी के किनारों पर बने मंदिरों के घाटों पर लोगों के लिए सांस लेना भी दुभर हो गया है।

वहीं नदी के जल में रहने वाले जीव जंतु लगातार खत्म होते जा रहे हैं।

दूसरी तरफ एनजीटी के कई निर्देशों के बावजूद चंबल नदी में गिरने वाले गंदे नालों को रोकने के लिए प्रशासन की नींद नहीं खुली है।

केवल दिखावे का काम ही अभी तक जिला प्रशासन और यूआईटी ने किया है।

भाजपा की सरकार ने चंबल को स्वच्छ रखने के केवल दावे ही किए है।

चंबल शुद्धीकरण के लिए लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता तो राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी बता रहे है।

वहीं यूआईटी चेयरमैन योजनाओं की स्वीकृति का इंतजार कर रहे है,

पहले की योजनाएं मॉनिटरिंग के अभाव में ठंडे बस्ते में चली गई हैं।

जगह-जगह केवल बदबू और प्रदूषित ही नजर आती है चंबल

चंबल में गिरने वाले नालों और इसके प्रदूषण का जांच की तो सामने आया कि सरकारों ने केवल योजना को चंबल

शुद्धीकरण नाम देने तक का ही काम किया है। जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।

कोटा शहर के शिवपुरा से लेकर केशोरायपाटन तक 22 किमी नदी में 53 छोटे बड़े नाले गिर रहे है।

इनकी वजह से जगह जगह नदी में प्लास्टिक और कचरा जमा है।

यहां तक की गोदावरी धाम के पास तो गिर रहे गंदे नाले में तीन फीट की प्लास्टिक की

थैली और बोतलों की परत जम गई है।

ऐसे में इसके नीचे से ही गंदा सीवरेज का पानी निकल चंबल में गिर रहा है।

ऐसा ही बैराज के पास दाई मुख्य नहर के वहां हो रहा है। साजीदेहड़ा नाले के पानी को तो

यूआईटी संचालित ट्रीटमेंट प्लांट में भेजा जा रहा है, यहां से ट्रीट होकर आ रहा पानी दुबारा साजीदेहड़ा नाले के गंदे पानी में मिल रहा है।

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