जयपुर के आराध्य गोविंद देव जी की मूर्ति को माना जाता है श्रीकृष्ण का साक्षात रूप, दर्शन कर निहाल हो जाते हैं भक्त

जयपुर के आराध्य गोविंद देव जी के मंदिर में हर रोज हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस मंदिर में स्थित गोविंद देव जी की प्रतिमा को भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप माना जाता है। आइए जानते हैं इसके हजारों साल पुराने पौराणिक इतिहास के बारे में…

गुलाबी शहर यानि जयपुर के श्याम रंग राजा गोविंद देव की महिमा अपरमपार है। भगवान श्रीकृष्ण के साक्षात स्वरूप भगवान गोविंद देव जी के दर्शन के लिए रोजाना हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं। अपनी रानी राधा के साथ गोविंद देव जी राजा की तरह सूर्यमहल में विराजमान हैं।

जयपुर के आराध्य देव गोविंद देव जी का वर्तमान स्वरूप सबके सामने है। लेकिन इसे अपने मूल स्वरूप में आने का भी अपना पौराणिक इतिहास है। इस मंदिर से कई किंवदंती और अनेक कथाएं जुड़ी हुई हैं। ऐसी मान्यता है कि गोविन्द देव जी की वास्तविक मूर्ति भगवान कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने लगभग 5000 साल पहले बनाई थी।

जब वज्रनाभ 13 साल के थे, तब अपनी दादी के बताये अनुसार उन्होंने श्री कृष्ण की एक मूर्ति बनाई। लेकिन जब उन्होंने अपनी दादी मां को वह मूर्ति दिखाई तो वे बोली कि इस मूर्ति के केवल चरण ही दिखने में भगवान कृष्ण के कमल चरणों के समान हैं। बालक वज्रनाभ ने दोबारा एक मूर्ति का निर्माण किया और फिर उसे अपनी दादी मां को दिखाया। लेकिन इस बार केवल धड़ ही दिखने में समान था।

वज्रनाभ ने एक तीसरी मूर्ति बनाई और जब उनकी दादी मां ने उसे देखा तो घूंघट कर लिया। इस बार मूर्ति का मुख बिल्कुल भगवान कृष्ण के समान था। इन तीन विग्रह में पहली मूर्ति ‘मदन मोहन जी’ को करौली, दूसरी मूर्ति ‘गोपीनाथ जी’ जयपुर के पुरानी बस्ती और तीसरी मूर्ति ‘गोविंद देव जी’ के रूप में स्थापित किया गया।

‘जन्माष्टमी’ के अवसर पर यहां लाखों की संख्या में भक्त भगवान गोविंद के दर्शन करते हैं। साथ ही यहां हाल ही में निर्मित सभा भवन को ‘गिनीज बुक’ में भी स्थान मिला है। सालों से ये मंदिर लोगों की आस्था का केन्द्र बना हुआ है। जो आज भी हर किसी भी अपनी ओर आकर्षित करता है।

यही नहीं गोविंद देव जी मंदिर में हर दिन आठ झांकियां लगती हैं। जिनमें से सात में श्रद्धालुओं ठाकुर जी के दर्शन कर सकते हैं। मंगला, धूप, श्रृंगार, राजभोग, ग्वाल, संध्या, शयन झांकियों में यहां विशेष आरती भी होती है। यहां त्योहार विशेष के अलावा श्रद्धालु अपने भगवान को पोशाक भी चढ़ा पाते हैं।

इसके अलावा यहां एकादशी पर विशेष सिंगाड़े या कुट्टू के आटे के लड्डूओं को भोग लगाया जाता है और नियमित मोतीचूर के लड्डू का भोग लगता है और य​ही प्रसाद के रूप में भी वितरित किया जाता है।

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