जाने कौन से हैं भारत के सबसे प्राचीन सूर्य मंदिर

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कोणार्क सूर्य मंदिर सूर्य देवता को समर्पित रथ के आकार में बना ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर भारत की मध्यकालीन वास्तुकला का श्रेष्‍ठ उदाहरण है। इस सूर्य मंदिर का निर्माण राजा नरसिंहदेव ने 13वीं शताब्दी में करवाया था। यहां पर सूर्य देवता के रथ में पत्थर के 12 जोड़ी पहिए लगे हैं और रथ को खींचने के लिए 7 घोड़े जुते हुए हैं। वैसे इस मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है क्‍योंकि यहां की सूर्य प्रतिमा पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रख दी गई है। ये सूर्य मंदिर समय की गति को भी दर्शाता है। पूर्व दिशा की ओर जुते 7 घोड़े सप्ताह के सातों दिनों के, 12 जोड़ी पहिये दिन के चौबीस घंटे के, और 8 ताड़ियां दिन के आठों प्रहर के प्रतीक हैं। वैसे पहियों के बारे में कहा जाता है कि 12 जोड़ी पहिये साल के बारह महीनों के बारे में संदेश देते हैं।

मार्तंड सूर्य मंदिर इस मंदिर का निर्माण मध्यकाल में 7वीं से 8वीं शताब्दी में हुआ था। सूर्य राजवंश के राजा ललितादित्य ने अनंतनाग के पास एक पठारी क्षेत्र में इसका निर्माण करवाया था। मार्तंड सूर्य मंदिर में 84 स्तंभ हैं जो समान अंतराल पर रखे गए हैं, इसे बनाने के लिए चूने के पत्थर की चौकोर ईंटों का उपयोग किया गया है।इसके बारे में एक कहानी प्रसिद्ध है कि यहां सूर्य की पहली किरण निकलने पर राजा इस सूर्य मंदिर में पूजा कर चारों दिशाओं में देवताओं का आह्वान करने के बाद अपनी दिनचर्या आरंभ करते थे। अब खंडहर में तब्‍दील हो चुके इस मंदिर की ऊंचाई मात्र 20 फुट ही रह गई है।

मोढ़ेरा सूर्य मंदिर अहमदाबाद से लगभग 100 किलोमीटर की दूर स्‍थित है मोढ़ेरा सूर्य मंदिर। यहां स्‍थापित एक शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम ने करवाया था। सोलंकी सूर्यवंशी थे, और वे सूर्य को कुलदेवता के रूप में पूजते थे। इसलिए उन्होंने मोढ़ेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण में कहीं भी चूने का उपयोग नहीं किया गया है। ईरानी शैली में बने इस मंदिर के तीन हिस्से हैं, पहला गर्भगृह, दूसरा सभामंडप और तीसरा सूर्य कुण्ड। मंदिर के गर्भगृह के अंदर की लंबाई 51 फुट 9 इंच और चौड़ाई 25 फुट 8 इंच है। सभामंडप में कुल 52 स्तंभ हैं। इन स्तंभों पर बेहतरीन कारीगरी से विभिन्न देवी-देवताओं के चित्रों और रामायण तथा महाभारत की कथाओं को दर्शाया गया है। ये स्तंभ नीचे से देखने पर अष्टकोणाकार और ऊपर से देखने पर गोल दिखते हैं। मंदिर के निर्माण में ख्‍याल रखा गया है कि सुबह सूर्य की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह को रोशन करे। सभामंडप के आगे एक विशाल कुंड सूर्यकुंड है जिसे रामकुंड भी कहते हैं। अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमणों से मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा और कई मूर्तियां खंडित हो गई। फिल्‍हाल ये मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।

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