जुलाई तक 4.94 किलोमीटर लंबे इस पुल का निर्माण पूरा, मोदी करेंगे उद्घाटन

असम में डिब्रूगढ़ के पास देश की सबसे लंबी सड़क और रेल पुल का काम पूरा होने जा रहा है. डिब्रूगढ़ को अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट से जोड़ने जा रहे इस अनूठे पुल का काम इस साल जुलाई तक पूरा हो जाएगा. रेलवे के अधिकारियों के मुताबिक बोगीबील पुल के नाम से मशहूर पुल को जुलाई तक पूरा कर दिया जाएगा. रेल मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक इस पुल का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे.

बता दें, बोगीबील पुल को पूरा करने के लिए रात दिन काम किया जा रहा है. यहां पुल के सभी पिलर लगाए जा चुके हैं. अब बस एक छोटा सा हिस्सा बाकी है जिसको काफी तेजी से पूरा किया जा रहा है. बोगीबील पुल इस मायने में खास है कि इसी पर ट्रेन भी चलेगी और इस पर बने हाईवे पर कार और ट्रक भी दौड़ सकेंगे. 4.94 किलोमीटर की लंबाई वाले बोगीबील पुल की खासियत है कि यह वेल्डिंग करके बनाया गया है. इस तरह का और इतना लंबा रेल और रोड पुल भारत में पहला है. बोगीबील पुल के मुख्य अभियंता कंस्ट्रक्शन महेंद्र सिंह के मुताबिक इस साल जुलाई तक 4.94 किलोमीटर लंबे इस पुल का निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा.

भारत के पहले और एशिया के दूसरे सबसे लंबे रेलवे और रोड पुल के ऊपर 3 लाइन की एक सड़क है और उसके नीचे दोहरी रेल लाइन है. यह पुल ब्रम्हपुत्र के जल स्तर से 32 मीटर की ऊंचाई पर है. खास बात यह है कि इस तरह की तकनीक से स्वीडन और डेनमार्क को जोड़ने वाले पुल को बनाया गया है. बोगीबील पुल की तकनीक की श्रेष्ठता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसको बनाने में डेनमार्क से तकनीक ली गई तो वहीं इसकी टेस्टिंग का काम जर्मनी ने किया.

रेल मंत्रालय के डायरेक्टर इनफार्मेशन एंड पब्लिसिटी वेद प्रकाश बोगीबील पुल को लेकर काफी आशान्वित हैं उनका कहना है कि यह पुल पूर्वोत्तर में विकास का प्रतीक साबित होगा. इसके अलावा इस इलाके में आवाजाही का एक बड़ा उपयोगी साधन बनेगा. उन्होंने कहा कि चीनी सीमा पर तैनात सशस्त्र बलों को भी बोगीबील से काफी सहूलियत हो जाएगी. रेलवे अधिकारियों के मुताबिक ट्रेन से डिब्रूगढ़ से अरुणाचल प्रदेश जाने के लिए व्यक्ति को गुवाहाटी होकर जाना होता है. और इसके लिए उसे तकरीबन 600 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करनी होती है. इस पुल के बन जाने से यह यात्रा काफी आसान हो जाएगी.

1985 में हुए असम समझौते के मुताबिक बोगीबील पुल को ब्रह्मपुत्र के ऊपर बनाने के लिए केंद्र सरकार ने सहमति जताई थी. इसके 11 साल बाद बोगीबील पुल को 1996 में ही मंजूरी मिल गई थी. लेकिन इसका निर्माण कार्य 2002 में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने शुरू किया था. यूपीए सरकार ने 2007 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर दिया था. असम के डिब्रूगढ़ को अरुणाचल के पासीघाट से जोड़ने वाले भारत के सबसे लंबे और रणनीतिक तौर पर महत्त्वपूर्ण बोगीबील पुल का काम 2002 से शुरू होने के बाद काफी धीमा पड़ गया था. खास बात यह है कि कांग्रेस की सरकार ने 2009 में इसका उद्घाटन करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन यह हो न सका. 2014 में मोदी की सरकार बनने के बाद बोगीबील पुल पर तेजी से काम शुरू हुआ और आज पूरा होने की स्थिति में नजर आ रहा है.

बोगीबील पुल डिब्रूगढ़ शहर से 17 किलोमीटर दूरी पर ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहा है. बोगीबील पुल की अनुमानित लागत 5800 करोड़ रुपये है. इस पुल के बन जाने से ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी किनारे और उत्तरी किनारे पर मौजूद रेलवे लाइन आपस में जुड़ जाएंगे. ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी किनारे पर मौजूद चल खोवा और मोरान हॉट रेलवे स्टेशन तैयार हो चुके हैं. वहीं दूसरी तरफ रंगिया से आने वाली रेलवे लाइन को बोगीबिल ब्रिज के उत्तरी हिस्से तक पहुंचा दिया गया है. ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी हिस्से पर स्टेशन तैयार हो चुका है. रेलवे लाइन भी बिछ चुकी है. टंगानी और धमाल रेलवे स्टेशन बोगीबील पुल के जरिए आपस में जुड़ जाएंगे.

ब्रह्मपुत्र नदी डिब्रूगढ़ इलाके में काफी बड़ी नदी है. यह नदी इतनी बड़ी है कि यहां पर किलोमीटर तक इसकी चौड़ाई मापी जाती है. बोगीबील गांव के पास में ब्रह्मपुत्र नदी को दो तटबंधों से बांधा गया है. 10 किलोमीटर चौड़ी नदी को बांध कर 5 किलोमीटर के अंदर समेटा गया है. नदी को बांधकर इस पर लोहे के बड़े-बड़े टुकड़े आपस में वेल्डिंग के जरिए जोड़े गए हैं. इस पुल को बनाने में भारी संख्या में वेल्डिंग रॉड इस्तेमाल की गई है.

रेलवे के चीफ इंजीनियर कंस्ट्रक्शन महेंद्र सिंह के मुताबिक पुल के निर्माण में तकरीबन 35 लाख बोरी सीमेंट का इस्तेमाल हुआ है. इस पुल को अत्याधुनिक तकनीक ट्रायंगल ट्रस की तर्ज पर बनाया गया है. पुल को बनाने के लिए डी के आकार में बड़े-बड़े खंभे डाले गए हैं. रेलवे के इंजीनियर के मुताबिक पुल के लिए 42 भारी भरकम खंभे बनाए गए हैं. इन खंभों को ब्रह्मपुत्र नदी के ताले में वेल फाउंडेशन बनाकर जमाया गया है. हर एक खंभा ब्रह्मपुत्र नदी के अंदर 65 मीटर की गहराई तक डाला गया है. इस पुल को बनाने के लिए सबसे बेहतरीन सीमेंट का इस्तेमाल किया गया है.

प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर के मुताबिक बोगीबील पुल को काफी मजबूत बनाया गया है. वजह यह है कि ब्रह्मपुत्र का यह इलाका भूकंप के लिहाज से सबसे खतरनाक जोन में आता है. लिहाजा पुल को 8 से ज्यादा मैग्निट्यूड के भूकंप को सहने के काबिल बनाया गया है. इस पुल के खंभे इतने ज्यादा मजबूत बनाए गए हैं, जिससे ब्रह्मपुत्र की बड़ी से बड़ी बाढ़ का इस पर थोड़ा भी असर न पड़े.

बोगीबील का पुल भारत के लिए रणनीतिक तौर से काफी महत्वपूर्ण है. भारतीय सेना और सुरक्षाबलों को अरुणाचल और असम के सभी हिस्सों के लिए ऑल टाइम कनेक्टिविटी देने के लिए यह पुल महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. इसके जरिए अरुणाचल में कई जगहों को रेलवे लाइन से सीधा जोड़ा जा सकेगा. भारत सरकार ने पहले ही तवांग के लिए रेलवे लाइन बिछाने का ऐलान कर दिया है. ऐसे में बोगीबील पुल अरुणाचल को पूरी तौर से भारतीय रेलवे के अलग-अलग स्टेशनों से जोड़ने का काम करेगा.

  • 2
    Shares

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

loading...