डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये से महंगा हो सकता है इलाज

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 मुंबई  डॉलर के मुकाबले कमजोर होता रुपया भारत में बीमार लोगों का मेडिकल बिल बढ़ा सकता है। डॉलर और यूरो के मुकाबले रुपये की कमजोरी और इन्फ्लेशन की वजह से कार्डिएकट्स, ऑर्थोपे स्टेंडिक इम्प्लैन्ट, हार्ट वॉल्व और कैथटर जैसे मेडिकल डिवाइसेज की कीमतें बढ़ सकती हैं। 

जनवरी से अगस्त के बीच रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 10.7 फीसदी गिर चुका है और यूरो की तुलना में 7.6 फीसदी कमजोर हो चुका है। इसके अलावा इन्फ्लेशन की वजह से भी ऑपरेटिंग कॉस्ट 5-6 फीसदी बढ़ चुका है।
अधिकतर मेडिकल डिवाइसेज का आयात महंगा हो चुका है और यदि इसे मरीजों तक पास किया जाता है तो उनका मेडिकल बिल बढ़ जाएगा। इंडस्ट्री से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि आयात दर में वृद्धि हुई है, लेकिन अभी कंपनियां इसका वहन कर रही हैं।

भारत 80 फीसदी मेडिकल डिवाइसेज अमेरिका से आयात करता है। कार्डिएक स्टेंट्स और अन्य उपकरणों की कीमत सरकार ने तय कर दी है, इसलिए कंपनियां अप्रूवल के बिना एमआरपी नहीं बढ़ा सकती हैं। मेडिकल डिवाइसेज इंडस्ट्री ने नैशनल फार्मासूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) से 10 फीसदी कीमत बढ़ाने की मांग की है। कीमतों में एक साल में इतनी वृद्धि स्वीकृत भी है।

 सरकार अभी कीमतों में बदलाव की अनुमति देने की पक्षधर नहीं है। मेडिकल टेक्नॉलजी असोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन पवन चौधरी ने कहा, ‘हम वित्त और स्वास्थ्य मंत्रालय से कस्टम ड्यूटी में छूट की अपील करेंगे ताकि कीमतों में वृद्धि (कंपनियों के लिए) समायोजित हो सके।’ अभी इन डिवाइसेज पर 8-28 फीसदी कस्टम ड्यूटी है।
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