तमिल राजनीति में रिक्तता!

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अपनी लम्बी सियासी पारी खेलने के बाद द्रविड़ राजनीति के पुरोधा ‘कलाइनार’ यानी एम. करुणानिधि ने ऐसे समय में इस दुनिया से विदा ली है, जब तमिलनाडु की राजनीति एकदम अधरझूल अर्थात् चौराहे पर खड़ी नजर आ रही है। पिछले पांच दशकों से करुणानिधि चाहे सत्ता में रहे हों या विपक्ष में, वह प्रदेश ही नहीं देश की राजनीति का भी रूप और आकार तय करने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह कि उन्होंने प्रदेश में राजनीति का जो मुहावरा गढ़ा, उनके विरोधियों को भी उसी दायरे में राजनीति करनी पड़ी। धर्म और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर संविधान और संवैधानिकता को सर्वोच्च स्थान देने वाली राजनीति के लिए ठोस जमीन तैयार करने का काम पेरियार और अन्नादुरै के इस काबिल शिष्य ने ही किया, ऐसा कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

यह करुणानिधि के ही वश की बात थी कि आपातकाल का ताप झेलने के बावजूद उसके ठीक बाद वह इंदिरा गांधी की कांग्रेस से और हिंदी व हिंदुत्व के विरोध की राजनीति करने के बावजूद भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए से हाथ मिला लेना, क्या आज ऐसी कूव्वत अन्य किसी सियासतदा में मिल सकती है! ऐसे में आज जब वह मार्गदर्शन के लिए उपलब्ध नहीं हैं तो देखना होगा कि तमिलनाडु की राजनीतिक शक्तियां इस शून्य को भरने के लिए किस-किस तरह की कवायद शुरू करती हैं। निश्चित रूप से करुणानिधि का जाना राष्ट्रीय राजनीति में एक छोटी, किंतु मजबूत लहर की मौजूदगी का थम जाना है। इसके बाद यह सवाल बना रहेगा कि अब डीएमके और उसका भविष्य क्या होगा! इसकी परीक्षण भूमि आगामी 2019 का लोकसभा चुनाव बनेगा।

अब देखना होगा कि बड़ी कामयाबी हासिल करने के लिए एमके स्टालिन किस तरह डीएमके का नेतृत्व करते हैं। कविता के रूप में, पटकथा के रूप में अथवा व्यक्तिचित्र के रूप में करुणानिधि को दी गई श्रद्धांजलि ही पर्याप्त नहीं होगी। निश्चय ही, इसके लिए उनकी पात्रता तमिल भाषा और संस्कृति के विकास के लिए किए गए उनके योगदान के लिए है, लेकिन करुणानिधि का कद इससे कहीं ज्यादा बड़ा था। उनका मूल आधार द्रविड़ राजनीति रही।

करुणानिधि के जाने के बाद डीएमके क्या वैसा करिश्मा कर पाएगी

यह ध्यान रहे कि ईवी रामास्वामी नायकर और सीएन अन्नादुरैई के एक विद्यार्थी के तौर पर करुणानिधि ने द्रविड़ आंदोलन के संदेशों को तमिलनाडु के कस्बों और गांवों तक पहुंचाने के लिए अपनी समझ और भाषण कौशल को गति दी थी। आगे क्या होगा! इस प्रश्न का जवाब ढूंढना बहुत दिलचस्प होगा। डीएमके के भविष्य के लिए, निश्चय ही एमके स्टालिन की राजनीतिक शैली में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है।

चूंकि डीएमके पार्टी की राजनीति सीधे-सीधे करुणानिधि की पारिवारिक राजनीति से जुड़ी रही है। अत: सवाल है कि क्या स्टालिन डीएमके के बड़े नेताओं के साथ सौहार्द व सामंजस्य का रिश्ता कायम कर साथ चल सकेंगे…स्टालिन और अलागिरि एक साथ होंगे… कनिमोझी का क्या भविष्य होगा… और, क्या डीएमके में किसी सुदूर विभाजन की कोई संभावना है! इन प्रश्नों के अभी तात्कालिक जवाब नहीं हैं।

लेकिन समयचक्र का पहिया हर घाव को भर देता है। तमिलनाडु की राजनीति के पर्यवेक्षक यह देखने को उत्सुक हैं कि डीएमके के भीतरी झगड़े 2019 के लोकसभा चुनावों को किस कदर प्रभावित करेंगे। क्योंकि आगामी लोकसभा चुनाव अभियान में कई बातें पहली बार होंगी। जैसे पहली बार इस अभियान में न करुणानिधि होंगे और न ही जयललिता होंगी। पहली बार रजनीकांत और कमल हासन अपनी चुनावी पारी परख रहे होंगे तो पहली बार एआईडीएमके के तीन धड़े अम्मा की विरासत के साथ मतदाताओं के पास जाएंगे। ऐसा में यह सवाल तैरना भी स्वाभाविक है कि एमजीआर की माया से जुड़ा अम्मा का जादू क्या साल 2019 के लोकसभा चुनावों में काम करेगा। पहली बार ही तमिलनाडु में पंचकोणीय संघर्ष के नतीजों का भी परीक्षण करेगा, देखेगा भी।

एडीएमके के मुकाबले डीएमके, टीटीवी दिनाकरन गठबंधन है। कहने की आवश्यकता नहीं कि दो प्रतिद्वंद्वी और रजनीकांत एवं कमल हासन होंगे। निश्चय ही करुणानिधि को लेकर सहानुभूति होगी और डीएमके इसे मतों के रूप में भुनाने की कोशिशें करेगा। चूूंकि, करुणानिधि के अवसान से वास्तविक क्षति तमिलनाडु राज्य तथा तमिल भाषा की हुई है. इसलिए फिलहाल तो इस खालीपन को भरनेवाला कोई दिखाई नहीं दे रहा है। तमिलनाडु की राजनीति आश्चर्यजनक रूप से फिल्मी हस्तियों द्वारा निर्देशित होती रही है।

अभी जब ऐसी तीनों प्रमुख हस्तियां- एमजीआर, जयललिता और करुणानिधि- दुनिया से विदा हो चुकी हैं तो तमिल फिल्मों के दो सबसे चमकीले सितारे राजनीति में दस्तक भी दे चुके हैं। इनमें कमल हासन कांग्रेस के तो रजनीकांत भाजपा के करीब दिख रहे हैं। लेकिन इनके पीछे अभी संगठन की शक्ति नहीं है। जयललिता की पार्टी सत्ता में तो है, लेकिन उसके पास कोई स्वीकार्य चेहरा नहीं है। कांग्रेस के पास कुछ खास तबकों का सपोर्ट है, तो वह अपने आप में कोई बड़ी ताकत नहीं है। फिर भी डीएमके और कांग्रेस मिल-जुल कर रहे तो कलाइनार के नाम पर उपजी सहानुभूति का फायदा इन्हें मिल सकता है।

ऐसे में यह देखना ज्यादा दिलचस्प होगा कि भाजपा नेतृत्व दक्षिण भारत के इस अहम राज्य को अपने हाथ में बनाए रखने के लिए क्या करता है। अब तक की जो राजनीतिक तस्वीर उभरकर सामने आ रही है उसे देखते हुए दोनों राष्ट्रीय दल भाजपा और कांगे्रस को डीएमके और एआईडीएमके में से किसी एक के साथ गठजोड़ करना पड़ेगा। लेकिन जब दोनों तरफ ही अंतद्र्वंद्व की स्थिति हो तो किसके साथ पेचअप किया जाए यह तय कर पाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।

तमिलनाडु की राजनीति के पर्यवेक्षक यह देखने को उत्सुक हैं कि डीएमके के भीतरी झगड़े 2019 के लोकसभा चुनावों को किस कदर प्रभावित करेंगे। क्योंकि आगामी लोकसभा चुनाव अभियान में कई बातें पहली बार होंगी। जैसे पहली बार इस अभियान में न करुणानिधि होंगे और न ही जयललिता होंगी। पहली बार रजनीकांत और कमल हासन अपनी चुनावी पारी पर

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