नोहट्टा में CRPF वाहन के ड्राइवर ने बताई आपबीती, ऐसा खौफनाक था मंजर

श्रीनगर के नौहट्टा में 1 जून को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के वाहन पर जिस तरह हिंसक भीड़ की ओर से पथराव किया जा रहा था, वाहन को धक्के दिए जा रहे थे, वो तस्वीरें दहलाने वाली थीं. उस वक्त वाहन के अंदर बैठे सीआरपीएफ जवानों पर क्या बीत रही होगी, ये समझना मुश्किल नहीं है. उसी हिंसक विरोध के दौरान 21 वर्षीय कैसर मोहम्मद सीआरपीएफ के वाहन के नीचे आकर गंभीर रूप से घायल हो गया था. कैसर मोहम्मद ने अगले दिन अस्पताल में दम तोड़ दिया था.

सीआरपीएफ वाहन में उस वक्त एक अधिकारी और ड्राइवर समेत 4 जवान थे. इन पांचों ने इंडिया टुडे से बात करते हुए माना कि उस दिन कुछ भी हो सकता था, वो दिन उनकी जिंदगी का आखिरी दिन भी हो सकता था. बाहर हिंसक भीड़ के हाथ में जो भी आ रहा था, पत्थर, साइकिल वो सीआरपीएफ के वाहन पर बरसाए जा रहे थे. उन्हें वाहन से बाहर निकालने की भी कोशिश की जा रही थी. इतना सब कुछ होते हुए भी जवानों ने संयम बनाए रखा और आत्मरक्षा के लिए फायरिंग का सहारा नहीं लिया.

सीआरपीएफ के वाहन की ड्राइविंग सीट पर उस दिन मौजूद रहे 25 वर्षीय विशाल जी पवार का कहना है कि जैसा तस्वीरों में दिखा, हालात उससे कहीं ज्यादा खराब थे. तीन साल पहले ही सीआरपीएफ ज्वाइन करने वाले पवार ने कहा, ‘भीड़ इतनी थी कि वाहन का खिसकना मुश्किल हो गया था. वो चारों तरफ से वाहन को बड़े हिंसक ढंग से हिला रहे थे. पथराव इतना तेज था कि मुझे दिखाई भी नहीं दे रहा था. वाहन को जोर जोर से हिलाया जा रहा था. आगे कुछ भी नहीं दिख रहा था, मुझे उस वक्त अहसास भी नहीं हुआ कि गाड़ी के नीचे कोई आ गया है.”

पवार ने बताया, “भीड़ की ओर से वाहन पर ना सिर्फ पत्थर बल्कि साइकिलें तक फेंकी जा रही थीं. वाहन के बोनेट पर भी कई लोग चढ़कर कूद रहे थे. यहीं नहीं वाहन का दरवाजा खोलने की कोशिश भी कर रहे थे. पवार के मुताबिक उन्होंने और जीप पर सवार उनके साथियों ने बाद में उस दिन का वीडियो देखा. वीडियो में जैसा दिख रहा था, असल में हालात उससे कहीं ज्यादा खराब थे. वो वाहन को आग भी लगा सकते थे. पवार ने कहा, ‘वो मेरी जिंदगी का सबसे खराब दिन था.’

सीआरपीएफ के वाहन में उस दिन सेंकेंड इन कमांड अधिकारी एस एस यादव ड्राइवर के साथ वाली सीट पर ही बैठे हुए थे. 54 वर्षीय यादव को सर्विस में 30 साल हो चुके हैं. उनकी कश्मीर में तीन पोस्टिंग रही हैं.

यादव ने बताया, “उस दिन हम नोहट्टा में सीआरपीएफ की दो और एमआर गंज में एक कंपनी के सुपरविजन के लिए गए थे. सब कुछ सामान्य था. जब हम एमआर गंज से लौट रहे थे तो ख्वाजा बाजार के पास भीड़ से घिर गए. वाहन को दूसरी लेन से नोहट्टा जाने के लिए मोड़ा तो भीड़ हिंसक हो उठी. हर तरफ से वाहन पर पथराव होने लगा.”

यादव के मुताबिक उन्होंने ड्यूटी पर पहले भी ऐसी स्थितियों का सामना किया था लेकिन उस दिन जैसा पथराव पहले कभी नहीं देखा. यादव ने

कहा, “हमारे लिए ये जान बचाने का सवाल हो गया था. एक वक्त तो मेरा हाथ बंदूक पर भी चला गया लेकिन दिल में यही प्रार्थना कर रहा था कि इसकी नौबत ना आए. भीड़ इतनी थी कि एक बार तो ड्राइवर को वाहन रोकना भी पड़ गया. उसी वक्त मुझे बाहर खींचने की कोशिश की गई. लेकिन मेरे पीछे बैठे सीआरपीएफ जवान ने तत्काल दरवाजा जोर से बंद कर दिया. बाहर निकाल लिए जाने पर हमारे साथ कुछ भी हो सकता था.”

यादव ने कहा, “मुझे पता था कि बंदूक विकल्प नहीं है. उससे भीड़ में लोग हताहत होते. मैंने तब जीप में जवानों से कहा था कि जब तक मैं ना कहूं कोई फायर नहीं करेगा.” यादव ने एक मिनट के लिए तब सीआरपीएफ कमांडेंट रणदीप सिंह से भी बात की. यादव के मुताबिक अगर भीड़ जवानों को बाहर निकाल लेती तो उन्हें पीट-पीट कर ही मार दिया जाता. ठीक वैसे ही जैसे जम्मू कश्मीर पुलिस के डीएसपी अयूब पंडित को जामा मस्जिद के पास पीट-पीट कर मार दिया गया था.

सीआरपीएफ वाहन पर उस दिन यादव और पवार के साथ कांस्टेबल निंगप्पा नाटेकर, कांस्टेबल राम अवतार और कांस्टेबल राम नरेश भी मौजूद थे. तीनों ने एक साथ कहा कि वो हमारी जिंदगी का आखिरी दिन भी हो सकता था.

कांस्टेबल अवतार ने कहा, “क्रुद्ध भीड़ हमारे वाहन का रास्ता रोक रही थी. हम अंदर बैठे थे लेकिन वाहन को जोर-जोर से पीटे जाने की आवाज सुन रहे थे. वो हम सबके लिए बड़े तनाव वाले लम्हे थे. हम सब बाल बाल बचे.”

वाहन पर सवार रहे पांचों जनों की काउंसलिंग सीआरपीएफ के मेडिकल स्पेशलिस्ट डा सुनीम खान कर रहे हैं. डा खान ने कहा, “जब मैंने उस घटना के बाद उन्हें देखा तो सभी स्तब्ध थे. यादव का ब्लड प्रेशर कम था. लोग ये नहीं समझते कि वर्दी के अंदर भी इनसान हैं. उनकी काउंसलिंग की गई हैं. हम उन्हें कुछ दिन ऑब्सर्व करेंगे.”

डॉ खान के मुताबिक ड्राइवर पवार एफआईआर को लेकर आशंकित था लेकिन उसे बताया गया कि संगठन की ओर से उसे पूरा सपोर्ट किया जाएगा.

श्रीनगर में सीआरपीएफ के आईजी रविदीप साही ने कहा, “ड्राइवर और ऑफिसर ने उस वक्त जो किया वही सबसे सही कदम था. अहम ये था कि जवानों ने फायरिंग नहीं की. ऐसा करके उन्होंने कीमती जानों को बचाया. ऐसा करके उन्होंने निश्चित रूप से अच्छा काम किया.

सीआरपीएफ अधिकारियों ने जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के रुख का समर्थन नहीं किया. अधिकारियों के मुताबिक 1 जून को हुई घटना त्रासद है लेकिन इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए. उमर अब्दुल्ला ने घटना के बाद ट्वीट कर कहा था कि संघर्ष विराम का मतलब बंदूक उठाना नहीं है लेकिन तो इसका मतलब क्या है कि अब जीप का प्रयोग हो रहा है.

सीआरपीएफ ड्राइवर पर एफआईआर दर्ज किए जाने के बारे में जम्मू और कश्मीर पुलिस के डीआईजी एसपी वैद ने कहा, “मैं इस मामले पर नहीं बोलना चाहता लेकिन मौत हुई है इसलिए एफआईआर दर्ज की गई है.”

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