पेट भरने पर भी कुपोषित है आपका बच्चा

अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर से बेहतर आहार देते हैं ताकि वे सेहतमंद रहें, लेकिन क्या आपको वास्तव में लगता है कि शिशुओं को पूरा पोषण मिल रहा है? हम सभी यही सोचते हैं, इसके बावजूद आंकड़े ठीक इसके उलट दिशा में इशारा करते हैं। आमतौर पर जब शिशुओं को ठोस आहार देना शुरू किया जाता है तो भारतीय अभिभावकों का पूरा ध्यान शिशु के शारीरिक विकास पर होता है। शायद यह जागरुकता की ही कमी है कि लोगों को शिशुओं के मानसिक विकास के लिए जरूरी माइक्रोन्यूटियंट के बारे में कोई जानकारी नहीं होती है और यूनिसेफ के आंकड़े इस बात की पुष्टि करने के लिए काफी हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि बच्चों के लिए आयोडीन शुरुआती सालों में बहुत महत्वपूर्ण होती है, जो दिमाग के लिए जरूरी है। दुनियाभर की करीब 30 फीसद जनसंख्या आयोडीन की कमी में जी रही है। विटामिन-ए की कमी से कम व औसतन आय वाले देश, खासतौर से सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया के एक तिहाई बच्चे प्रभावित हैं। विकासशील देशों में पांच साल से कम उम्र के 40 फीसद बच्चे एनीमिया से ग्रस्त हैं। दरअसल जब शिशुओं को ठोस आहार देना शुरू किया जाता है तो उसे मां के दूध के साथ ऐसे आहार देने की जरूरत होती है जिसमें प्रचुर मात्रा में मैक्रोन्यूटियंट यानि कि कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन इत्यादि और माइक्रोन्यूटियंट जैसे विटामिन व मिनरल हों, ताकि शिशु के शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास भी सही तरीके से हो सकें।
माइक्रोन्यूटियंट की कमी से शिशु का न सिर्फ मानसिक विकास प्रभावित होता है बल्कि उनका इम्यून सिस्टम भी कमजोर हो जाता है, जिससे कई तरह के खतरनाक संक्रमण होने की आशंका रहती हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here