फिल्म ‘धड़क’ नहीं ‘धड़का’ पायेंगी दिल

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मुंबई।  गरीब लड़का, अमीर लड़की, भागकर शादी करना… वगैरह, आप कई फिल्मों में देख चुके हैं। ऐसा ही कुछ इस फिल्म में हुआ है।  हमारी रिपोर्टर के अनुसार मूवी का The End ज्यादा नहीं आया किसी को समझ।

उदयपुर के दबंग नेता रतन सिंह (आशुतोष राणा)किसी भी तरह विधानसभा चुनाव जीतना चाहते हैं। इसके लिए वो किसी की बेटी की इज्जत उछालने से भी परहेज नहीं करते।  उनकी बेटी पार्थवी (जाह्वनी कपूर) कॉलेज में पढ़ाई करती है।  और उसे छोटी जाति के लड़के मधुकर (ईशान खट्टर) से प्यार हो जाता है।

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जैसे ही इस बारे में घरवालों को भनक लगती है।  वो मधुकर की पिटाई करवा देते हैं।  अपने प्यार को बचाने के लिए पार्थवी हर मुमकिन हथकंडे अपनाती है।  और फिर दोनों भाग जाते हैं।  उदयपुर से मुंबई, नागपुर होते हुए ये दोनों कोलकाता पहुंचते हैं।

वही उनकी लाइफ की नई शुरुवात होती है की इसके आखिर में अलग ही बदलाव आता है।  वही मूवी खत्म हो जाती है।  पर दर्शको के मन में ये बात रहें जाती हैं क्या इस फिल्म का पाठ दूसरा बनेगा ?

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ये फिल्म एक्टिंग के मामले में बहुत कमजोर है।  जाह्नवी को इस फिल्म में ऐसा किरदार मिला है कि अपने सारे शेड्स दिखा सकती थीं।  चाहें बाइक चलाना हो या फिर गन नैना चार करने से लेकर प्यार, तकरार, बागीपन तक… हर रंग दिखाने का मौका था जाह्नवी के पास लेकिन वो कहीं भी उसे अपनी एक्टिंग में उतार नहीं पाई हैं।  जाह्नवी कपूर को अपनी भाषा में राजस्थानी टच देना होता है।  जिसकी वजह से बिल्कुल ही फिट नहीं बैठती हैं।  डायलॉग बोलते समय उनका एक्सेंट भी फेक लगता है।

इमोशनल सीन्स में वो बिल्कुल भी जान नहीं भर पाती।  इसमें उन्हें बहुत ही सशक्त लड़की का किरदार मिला है।  जिसे गाड़ी के साथ-साथ गन चलाना भी आता है।  लेकिन जाह्नवी कॉन्फिडेंट नहीं दिखतीं।

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‘धड़क’ के लिए जब डायरेक्टर शशांक खेतान का नाम आया तो उम्मीदें थोड़ी बढ़ीं।  वजह ये थी कि दो साधारण लव स्टोरी ‘बदरीनाथ की दुल्हनिया’ और ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियां’ को वो डायरेक्ट कर चुके हैं और ये दोनों ही फिल्में कमर्शियली कामयाब रही हैं।  लेकिन ‘धड़क’ की कहानी को देख कर इन दोनों फिल्मों की बराबरी भी नहीं कर पाई।

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इसमें बड़ी जाति और छोटी जाति की बात कही गई है।  लेकिन वो दिखाई नहीं देता  मधुकर के पापा जब उससे कहते हैं।  कि ‘हम छोटी जाति के हैं तू उससे दूर रह…’ तब दर्शक को पता चलता है कि मामला यहां जाति का भी है।  सबसे बड़ी खामी ये है कि सेकेंड हाफ में फिल्म के बाकी किरदारों को गायब कर दिया गया है।  पूरा फोकस पार्थवी और मधुकर की ज़िंदगी को दिखाने पर है।  कहीं-कहीं फिल्म इतनी स्लो है कि आगे ही नहीं बढ़ती, तो कहीं इतनी तेज आगे बढ़ जाती है।  कि आप सोचने लगते हैं कि ये हो क्या रहा है।  मेकर्स को खुद ही नहीं पता कि फोकस किस पर करना है।

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क्यों देखें/ना देखें

अगर आपने ‘सैराट’ देखी हो तो उसके कुछ सीन तो ऐसे हैं कि आपकी धड़कनें रुक जाती हैं।  सांसें थम जाती हैं।  लेकिन ‘धड़क’ आपका दिल नहीं ‘धड़का’ पाती।  फिल्म की शुरुआत तो बिल्कुल ‘सैराट’ जैसी है।  क्लाइमैक्स में थोड़ा बदलाव किया गया है जो शानदार है।  लेकिन एकाध सीन से और फिल्म के आख़री सीन से फिल्म देखना बेकार जायेंगा ।

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