बक्सर में रेलवे पुलिस ने लावारिस शव को गठरी बना गंगा में फेंका

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बक्सर। हमारे समाज में जब किसी की मौत होती है तो उसके धर्म के हिसाब से उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। लावारिस लाशों के लिए भी यह व्यवस्था बनाई गई है, लेकिन विश्वामित्र की पावन भूमि पर ना तो लावारिस शवों को जलाया जाता है, ना ही दफनाया जाता है। किसी गठरी और कूड़े की तरह नदी में फेंक दिया जाता है। ऐसा कोई और नहीं बल्कि वहां की पुलिस करती है।

किसी गठरी या कूड़े की तरह नदी में जिसको फेंका गया है, वह कुछ और नहीं इंसान की लाश है। मुमकिन है इस जगह पर हम और आप भी हो सकते हैं। मतलब हम में से कोई भी, जिसकी बक्सर के आसपास रेलवे में सफर के दौरान जान चली जाती है, रेलवे उसके साथ यही सलूक करती है। तो चलिए शुरु से शुरु करते हैं बक्सर रेल स्टेशन के अधिकारियों और कर्मचारियों की मर चुकी इंसानियत और लापरवाह कारनामे की शर्मसार करने वाले दास्तां। बक्सर स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर एक, जहां जीआरपी कार्यलय के सामने लाश रखी है, उसे ठेले पर ये दोनों मिलकर डाल रहे हैं, उससे पहले प्लास्टिक और रस्सी से कसकर बांधा गया है ताकि रास्ते में ना गिरे, ना खुले। रेलगाड़ी के रुकते गी इसे लेकर चल दिया।

तो सुना इस ठेले वाले को जिसने कहा कि पोस्टमॉर्टम कराने ले जा रहे हैं। लेकिन पोस्टमॉर्टम के बाद ये कहां लेकर चल दिया, माजरा समझने के लिए हमारे संवाददाता ने पीछा किया। थोड़ी दूर चलने के बाद ये शख्स वीर कुंवर सिंह सेतु पर पहुंचा और रुक गया। हमें लगा शायद किसी का इंतजार कर रहा है फिर आगे जाएगा। लेकिन ये क्या, पहले से वहां मौजूद अपने साथी के साथ मिलकर इसने बॉडी को उठाकर गंगा में फेंक दिया। जी हां शव को बिना मुखाग्नि दिए, बिना अत्येष्टि किए गंगा के हवाले कर दिया, फिर से देखिए ये तस्वीर।

हमने फौरन ठेले चालक को रोका और पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया। किसके कहने पर ऐसा किया। इसके एवज में उसे क्या मिलता है। क्या रेल अधिकारियों की मिलीभगत से इंसानियत की अंत्येष्टि करने का ऐसा कारोबार होता है, जवाब सुनिए। इस खेल को समझने के लिए हमने रेलवे स्टेशन के बड़े अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई सामने नहीं आया। बड़ी मुश्किल से एक एएसआई मिले, उनका जवाब सुनिये।

तो पूरा माजरा आप भी समझ गए होंगे, कैसे यहां चंद रुपए की खातिर शवों की अंत्येष्टि का कारोबार होता है, बेशर्मी के हंटर से इंसानियत को कोमा में डाल रखा है। और तो और जिस गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, उसमें महज हजार रुपए की खातिर लाश को फेंका जा रहा है।

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