‘बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे सीबीआई अधिकारी’

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प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसफ की पीठ के समक्ष केन्द्र की ओर से अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने अपनी बहस जारी रखते हुये कहा कि इन अधिकारियों के झगड़े से जांच एजेन्सी की छवि और प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही थी।
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि केन्द्र का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जनता में इस प्रतिष्ठित संस्थान के प्रति भरोसा बना रहे।
वेणुगोपाल ने कहा, ‘जांच ब्यूरो के निदेशक और विशेष निदेशक के बीच विवाद इस प्रतिष्ठित संस्थान की निष्ठा और सम्मान को ठेस पहुंचा रहा था. दोनों अधिकारी, आलोक कुमार वर्मा और राकेश अस्थाना एक दूसरे से लड़ रहे थे और इससे जांच ब्यूरो की स्थिति हास्यास्पद हो रही थी।’
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इन दोनों अधिकारियों के बीच चल रही लड़ाई से सरकार अचम्भित थी कि ये क्या हो रहा है. वे बिल्लियों की तरह एक दूसरे से लड़ रहे थे।

वेणुगोपाल ने कहा कि दोनों के बीच चल रही इस लड़ाई ने अभूतपूर्व और असाधारण स्थिति पैदा कर दी थी. ऐसी स्थिति में सरकार के लिये इसमें हस्तक्षेप करना बेहद जरूरी हो गया था।

उन्होंने कहा कि केन्द्र ने अपने अधिकार क्षेत्र में रहते हुये ही इस साल जुलाई और अक्टूबर में मिली शिकायतों पर कार्रवाई की थी. उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने ऐसा नहीं किया होता तो पता नहीं दोनों अधिकारियों के बीच लड़ाई कहां और कैसे खत्म होती।

अटार्नी जनरल ने केन्द्र की ओर से बहस पूरी कर ली. सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग की ओर से बहस शुरू की जो कल भी जारी रहेगी।

केन्द्र ने आलोक वर्मा के खिलाफ अस्थाना की शिकायत पर केन्द्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट का अवलोकन किया था जिसमे कुछ सिफारिशें की गयी थीं. इसके बाद ही दोनों अधिकारियों को अवकाश पर भेजा गया था।

बाद में, न्यायालय ने सीवीसी को वर्मा के खिलाफ शिकायत की जांच का निर्देश दिया था. सीवीसी ने सीलबंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट न्यायालय को सौंपी थी।

शीर्ष अदालत आलोक वर्मा को जांच ब्यूरो के निदेशक के अधिकारों से वंचित करने और उन्हें अवकाश पर भेजने के सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर सुनवाई कर रही है।

न्यायालय ने 29 नवंबर को कहा था कि वह पहले इस सवाल पर विचार करेगा कि क्या सरकार को किसी भी परिस्थिति में जांच ब्यूरो के निदेशक को उसके अधिकारों से वंचित करने का अधिकार है या उसे निदेशक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में कोई कार्रवाई करने से पहले प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति के पास जाना चाहिए था।

न्यायालय ने इससे पहले यह स्पष्ट कर दिया था कि वह जांच एजेन्सी के दोनों शीर्ष अधिकारियों से संबंधित आरोपों और प्रत्यारोपों पर गौर नहीं करेगा. आलोक वर्मा का जांच ब्यूरो के निदेशक का दो साल का कार्यकाल 31 जनवरी, 2019 को समाप्त हो रहा है।

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