रामलीला देखकर बिताया करता था बचपन : नवाजुद्दीन

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जयपुर। साहित्य उत्सव में बॉलीवुड से जुड़े सेलिब्रिटी, डायरेक्टर और एक्टर मौजूद रहे, ये बेहद महत्वपूर्ण सैशन रहे जिसके चलते युवाओं की भारी भीड़ नजर आई। फ्रंट लॉन में हुए कार्यक्रम के दौरान इतनी भीड़ थी कि पूरा पांडाल भरा हुआ नजर आया।

इस दौरान जेएलएफ में फिल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप,विशाल भारद्वाज और एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी के सेशंस को अटेंड करने में बड़ी संख्या में युवाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जेएलएफ में 6 पांडालों में कुल 47 सेशन का आयोजन किया गया, जिसमें विशाल भारद्वाज के सेशन रिवॉल्यूशनरी पोएट्स ऑन हेमलेट, हैदर एंड शेक्सपीयर्स एबिलिटी टू स्पीक ट्रूथ टू पॉवर आयोजित हुआ, जिसमें भारद्वाज ने अपनी फिल्म हैदर और महान कवि विलियम शेक्सपीयर को लेकर चर्चा की वहीं अनुराग कश्यप के सेशन ‘द हिटमैनÓ हुआ जिसमें भारी संख्या में युवा वर्ग उन्हें सुनने के लिए उपस्थित रहा।

नवाज का कल्चर करी
इसके बाद एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी और एक्ट्रेस एवं डायरेक्टर नंदिता दास के सेशन कल्चर करी में भी भारी संख्या में युवा जमा हुए। खासतौर पर नवाज की एक झलक पाने और उनके अनुभवों को सुनने के लिए युवाओं में काफी उत्साह दिखाई दिया। मकबूल, हैदर, मटरू की बिजली का मंडोला जैसी फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर विशाल भारद्वाज ने जहां एक तरफ ऑडियंस के सामने गजलें गाकर समां बांधा तो वहीं दूसरी ओर एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी जिंदगी से जुड़े मजेदार किस्से और उतार चढ़ाव के अपने दिनों को फैंस के सामने याद किया।

फिल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने अपनी फिल्मों में गालियों के उपयोग पर सफाई देते हुए बताया कि उनकी फिल्मों में गालियों का उपयोग करने को लेकर वो सेंसर बोर्ड तक को बता चुके हैं जहां से उन्हें क्लिन चिट भी मिल जाती है क्योंकि वो उन गालियों का पूरा मतलब सिद्ध कर देते हैं। वहीं नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बताया कि वो बचपन में पूरा दिन रामलीला देखकर बिताया करते थे जहां से उन्हें एक्टर बनने की प्रेरणा मिली। अनुराग कश्यप ने पद्मावती फिल्म का नाम लिए बिना कहा कि क्या एक फिल्म हमें खत्म कर सकती है। फिल्मों में हम वो ही डालते हैं, जो समाज में घटित हो रहा है। लेकिन इसे फिल्मों में देखने से समाज बचता है।

अनुराग कश्यप शुक्रवार को जेएलएफ में खुद की फिल्मों और जिंदगी के बारे में बता रहे थे। गुलाल फिल्म पर चर्चा करते हुए कश्यप ने कहा कि इसे बनाने में सात साल लगे। उन्होंने कहा कि कई राजपूत राज घरानों के सदस्यों से मुलाकात की तो पता चला कि राजपूत राज घराने इस बात से दुखी थे कि उनकी सरकार ने प्रिवीपर्स छीन ली। सुविधाएं और अधिकार खत्म कर दिए। राजपाट ले लिया। इससे उनमें काफी गुस्सा था। तब यह पता चला कि वे समय के साथ काफी पीछे चले गए हैं।

वे तरक्की करना तो चाहते थे, लेकिन अपने आलस्य के कारण कुछ कर नहीं पाए। कश्यप ने कहा कि वे भी यूपी के राजपूत परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इमरजेंसी के दौरान पिता ने नाम के आगे से सिंह हटा दिया। कश्यप ने कहा कि इमरजेंसी के दौरान राजपूत समाज के प्रति कुछ अलग सा सेंटीमेंट चल रहा था।

सेंसर बोर्ड से फिल्मकारों का विवाद चलता रहता था, लेकिन आप पूरे तथ्यों व दस्तावेज से अपनी बात रख देते हैं तो आपत्तियों का समाधान भी हो जाता है। मेरी कुछ फिल्मोंं गुलाल, गैंग्स ऑफ वसेपुर, सत्या आदि में सेंसर बोर्ड ने आपत्तियां लगाई थी, लेकिन मेरी समझाइश और दस्तावेज पेश करने से आपत्तियां दूर भी हो गई। उन्होंने कहा कि मुम्बई में वे हीरो बनने आए थे, लेकिन गंदी फिल्मों में काम करना पड़ा। बाद में फिल्म निर्देशन और लेखन में मन रम गया और कई फिल्में उन्होंने की।

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