रुद्राभिषेक कर शाम को सजाई फूलों की झांकियां 19 साल बाद दूसरे सोमवार को द्विपुष्कर योग

महानगर संवाददाता
जयपुर। 19 साल बाद सावन में विशेष योग बन रहा है, जो शांति और संपन्नता के नए मार्ग खोलेगा। भगवान शिव की पूजा-अर्चना-साधना के लिए विशिष्ट माने जाने वाले सावन में विश्व शांति और सम्पन्नता के नए मार्ग प्रशस्त होने के दो ज्योतिषीय आधार हैं।

पहला-सावन की शुरुआत श्रवण नक्षत्र में होना और दूसरा- सावन का पहला दिन शनिवार होना। इसमें भी धनिष्ठा नक्षत्र में द्विपुष्कर योग सोने में सुहागा का काम कर गया। सावन की शुरुआत शनिवार से होने की वजह से परिस्थितियां और भी अनुकूल बन रही हैं। वर्तमान के विरोधकृत संवत्सर के मंत्री शनि हैं।
शनि शिव के गण भी माने जाते हैं। इसलिए शिवभक्तों पर उनकी विशेष कृपा बनी रहेगी। वहीं श्रवण नक्षत्र को चंद्र नक्षत्र भी कहते हैं। शीतलता प्रदान करने वाले चंद्रमा भगवान शिव को विशेष प्रिय हैं। शीतलता के विशेष गुण के कारण महादेव ने चंद्रमा को शीश पर धारण किया है। शनि और चंद्रमा दोनों ही शिव भक्तों के विशेष सहायक होने वाले हैं। सावन महीने का तीस दिन का होना भी सुखद संयोग है। इस वर्ष सावन में रोटक व्रत भी है। आमतौर पर रोटक व्रत तभी आता है जब सावन में पांच सोमवार होते हैं। सावन के दूसरे

सोमवार को धनिष्ठा नक्षत्र में द्विपुष्कर योग अद्भुत संयोग है। यह 19 वर्ष बाद बन रहा है। यह योग भी समाज में शांति स्थापना में सहायक होगा।
दिनभर चला जलाभिषेक का दौर
सावन के पहले दिन छोटीकाशी के सभी शिवालयों में हर-हर महादेव के साथ शिवलिंग पर जलाभिषेक किया गया। अभिषेक के बाद भांग, धतूरा, बेलपत्र, चंदन, दूध, दही, घी, शहद, इत्र, फूल और फल चढ़ाए गए। ताड़केश्वर, झारखंड महादेव, जंगलेश्वर महादेव, चमत्कारेश्वर सहित सभी शिवालयों में सावन के पहले दिन शिवालयों में श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी। सुबह से ही श्रद्धालु मंदिरों में जलाभिषेक के लिए पहुंचने शुरू हो गए। शाम को शिवालयों में झांकी सजाकर भजन संध्या हुई। सावन के पहले सोमवार को शिवालयों में श्रद्धालुओं के लिए जल की विशेष व्यवस्था रहेगी। कई श्रद्धालु गलताजी से कावड़ लेकर आएंगे। सावन में सभी प्रमुख मंदिरों में गोठ के आयोजन भी बड़ी संख्या में होंगे। सहस्त्रघटाभिषेक के आयोजन भी लगभग हर दिन होंगे।

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