हिमाचली डॉक्टर को मिला वर्ल्ड बेस्ट रिसर्च पेपर अवॉर्ड

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अपने इस शोध को लेकर वैसे तो कई अवॉर्ड डॉ. भारती को मिल चुके हैं, लेकिन साउथ एशिया में मिला ये अवॉर्ड शोध को लेकर काफी अहम है. डॉ. भारती को ये अवॉर्ड अपने उस शोध के लिए दिया गया है, जिसके चलते रेबीज का जो इलाज पहले 30 से 40 हजार के बीच होता था. डॉ भारती के शोध के बाद वही इलाज 350 रुपये में होना संभव हो पाया है।
डॉ. भारती करीब 17 सालों से एंटी रेबीज वैक्सीन पर काम कर रहे थे. शोध में उन्होंने एक ऐसे सीरम को इजात किया जो पागल कुत्ते के काटने से होने वाले घाव पर लगाने से इसका असर जल्द होगा. इससे पहले जहां पागल कुत्ते या बंदर के काटने पर सिरम को घाव और मासपेशियों में लगाया जाता था, लेकिन डॉ. भारती ने अपने शोध से ये साबित किया कि रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन सिरम को घाव पर लगाने से असर जल्दी होगा।

सालों बाद इस काम को करने वाले डॉ. उमेश भारती के इस शोध को अब वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की ओर से मान्यता दी गई है, जिसके बाद अब विश्व स्तर पर इस नई तकनीक से पागल कुत्ते के काटने का इलाज हो पाएगा।

हिमाचल में बीते दो सालों से इसी तकनीक से इलाज किया जा रहा है. प्रदेश सरकार एंटी रेबीज की इस तकनीक को पूर्ण रूप से फ्री उपलब्ध करवा रही है।
डॉ. भारती ने बताया कि 17 सालों के अपने शोध के दौरान उन्होंने  कई मरीजों पर इस तकनीक का प्रयोग किया, लेकिन साल 2013 के बाद डॉ. उमेश भारती ने 269 मरीजों पर इस सीरम का उपयोग किया, जिसका सकारात्मक परिणाम देखने को मिला. उन्होंने कहा कि इलाज के बाद प्रदेश में एक भी मामला रेबीज का नहीं आया है और न ही बीमारी से किसी की मौत हुई है।
अपने शोध को मान्यता दिलवाने के लिए डॉ. भारती को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी और लंबे शोध के बाद मरीजों पर प्रयोग के बाद वो इसे मान्यता दिलवाने में सफल हुए. लोगों को नई तकनीक पर विश्वास दिलवाना मुश्किल था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार शोध को सही साबित करने के लिए प्रयोग करते गए. उन्हें सफलता तब मिली जब इस शोध को वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने मान्यता दी और इस तकनीक को विश्व भर के लिए बेहतर बताया।
[इस तरह के शोध से तैयार की गई है एंटी रेबीज वैक्सीन]

डॉ. उमेश भारती ने शोध कर जिस सीरम को तैयार किया है. वो घोड़े और आदमी के खून से बनता है, जिसकी उपलब्धता बहुत कम है. आदमी के खून से सीरम बनाने की कीमत पांच से छह हजार और घोड़े के खून से बनने वाले सीरम का खर्च करीब पांच सौ से छह सौ रुपये तक आता है. इससे पहले इस सीरम को जब मासपेशियों में लगाया जाता था तो इसकी मात्रा करीबन दस मिली लिटर के आसपास रहती थी, लेकिन अब घाव में लगाने से इसकी मात्रा एक मिली लिटर रह गई है, जिससे इसकी उपलब्धता और इस पर होने वाले खर्च में विश्व स्तर में भारी कमी आई है।

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