16 साल के एक छत्र राज के बाद वसुंधरा चली दिल्ली

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जयपुर।  राजस्थान की राजनीति में 16 साल तक एक क्षत्रप राज करने वाली पूर्व सीएम वसुंधरा राजे को दिल्ली ने अपने पास बुला लिया है. विधानसभा चुनाव के बाद से भाजपा आलाकमान की तरफ से लिए जा रहे कड़े फैसलों के बीच वसुंधरा को दिल्ली लेकर जाने का रास्ता तैयार हो गया. पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है. इस निर्णय के बाद ये साफ हो गया है कि वसुंधरा अब राज्य की नहीं, दिल्ली की सियासत देखेंगी. लेकिन, सबसे खास बात यह है कि इस बार दिल्ली के हर फैसले के आगे वसुंधरा खामोश हैं उनकी ये खामोशी सियासी गलियारों को उन चर्चाओं से भर रही है. जिसके लिए वे खास तौर पर जानी जाती हैं. हर किसी की जुबां पर बस एक ही सवाल है कि अपने निर्णय से दिल्ली को घुटने टेकने पर मजबूर करने वाली वसुंधरा इस बार चुप क्यों हैं।
2002 में राजस्थान आकर कमान संभालने से लेकर अब तक ‘राजस्थान मतलब वसुंधरा और वसुंधरा मतलब राजस्थान’ ही रहा है. राज्य से जुड़ा भाजपा का कोई भी निर्णय हो या नियुक्ति. हर किसी में वसुंधरा की सहमति ही जरूरी रही है. पार्टी की जड़ों तक अपनी पकड़ को मजबूत बनाकर रखने वाली वसुंधरा की ये छवि अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के एक निर्णय के बाद बदल जाएगी. उनकी कमान से राजस्थान भाजपा आगे निकल जाएगी और वसुंधरा दिल्ली की सियासत देखेंगी. लेकिन, इन सब के बीच अगर कुछ खास है तो फिर वसुंधरा की खामोशी. तेज तर्रार नेता और दृढ़ निश्चयी नेता के रूप में राजनीति के पटल पर पहचानी जाने वाली वसुंधरा चुनावी हार के बाद से दिल्ली के हर आदेश पर खामोश हैं. पहले नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाने फिर लोकसभा के लिए तैयार समिति में जगह नहीं देने के बाद राज्य से दिल्ली की तरफ रुख करने के आदेश पर भी वसुंधरा की चुप्पी हर किसी को हैरान कर रही है. सियासी गलियारों में उनकी इस चुप्पी के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म है. ये चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि, सियासतदार कई बार वसुंधरा के तेवर और दिल्ली की मजबूरी को देख चुके हैं. खास तौर पर हर किसी को 2009, 2012 और 2018 का एपिसोड अच्छे से याद है. तीनों ही बार वसुंधरा के तेवर के आगे दिल्ली के निर्णय बदलते रहे हैं।

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