असम में बिहू पर्व की धूम,जाने इसका महत्व, परंपरा

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बिहू असम का सबसे खास त्योहारों में से एक है। जब मौसम की पहली फसल को असम के लोग अपने देवता शबराई को अर्पित करते हैं। जिससे उनका घर हमेशा अनाज से भरा रहे। यह फसल पकने की खुशी में मनाया जाने वाला त्योहार है। जिसे असम के अलावा ओड़िशा, पंजाब, नेपाल, तमिल नाडु और केरल में भी मनाया जाता है। इस दिन नहा-धोकर, नए कपड़े पहनने का रिवाज़ है।
कब
15-21 अप्रैल 2019
कहां
असम

बिहू का महत्व 
नए साल की शुरूआत के साथ ही फसल कटाई, शादी-ब्याह के शुभ मुहुर्त की होती है शुरूआत और यही इसे बनाते हैं खास।

कैसे मनाते हैं बैसाख बिहू
बैसाख महीने से शुरू होता है असम का नया साल। 7 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार को अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इसे बोहाग बिहू के नाम से भी जाना जाता है। बिहू के पहले दिन गाय की पूजा होती है। सुबह-सुबह नदी में ले जाकर उसे स्नान कराया जाता है। नहलाने के लिए कच्ची हल्दी और कलई दाल का इस्तेमाल किया जाता है। उनके आसपास मच्छर-मक्खी को भगाने के लिए औषधि वाले पौधों से धुआं किया जाता है। गायों को बांधने के लिए नई रस्सी होती है। इस दिन लोग दिन में दही-चिवड़ा खाते हैं।
असमिया लोग इस नए साल की खुशी में तमाम तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। पकवानों के साथ ही हरी पत्तियों वाली साग-सब्जी खाई जाती है। बिहू में लोग बिहू डांस करते हैं जो यहां का पारंपरिक नृत्य है। ढोल, बांसुरी, पेपा, ताल की थाप पर नाचते महिला-पुरुषों का परिधान भी पारंपरिक होता है।

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शादी-ब्याह की होती है शुरूआत
बिहू फेस्टिवल के साथ ही यहां शुरू होता है शादी-ब्याह का दौर। जब महिलाएं अपनी पसंद से अपना जीवन साथी चुनती हैं। इस माह में यहां ज्यादातर शादी-ब्याह संपन्न होते हैं। रंगारंग कार्यक्रम त्योहार के उत्सव को बढ़ाए और बनाए रखने का काम करते हैं।

तीन तरह का होता है बिहू फेस्टिवल  
बिहू फेस्टिवल साल में एक नहीं बल्कि तीन बार आता है। जिसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। अप्रैल में मनाए जाने वाले बिहू को रोंगाली और बोहाग के नाम से जाना जाता है वहीं अक्टूबर के बिहू को कंगाली और काती के नाम से, तो जनवरी में मनाए जाने वाले को भोगाली और माघ बिहू के नाम से जाना जाता है।

बिहू में बनने वाले पकवान
इस दिन घरों में नारियल लड्डू, मच्छी पीतिका, बेनगेना खार, घिला पीठा बनाने का रिवाज़ है।

असम में यह त्योहार साल भर में तीन बार मनाया जाता है। दरअसल, मान्यता है कि इस दिन किसान अपने खेत से फसल को काटकर घर लाता है। घर अनाज से भरा होता है। ऐसे में लोग अपने ईष्ट देवता को ऐसे ही कृपा बनाए रखने के लिए प्रार्थना करते हैं। पहले मौसम की पहली फसल को असम के लोग सर्वश्रेष्ठ देता शबराई को अर्पित करते हैं। जानकारों के मुताबिक बिहू शब्द दिमासा लोगों की भाषा से लिया गया है जो की प्राचीन काल से एक कृषि समुदाय है।

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पीठा मिठाई और तिल के लड्डू बनाने की परंपरा

इस पर्व पर रंग बिरंगे कपड़े पहनते हैं और घरों को रंगोली से खूब सजाते हैं। इस मौके पर लोग दोस्‍तों रिश्‍तेदारों को शुभकामनाएं देते हैं। इस अवसर पर खास मिठाई पीठा बनाई जाती है। इसके अलावा तिल के लड्डू और नारियल के लड्डू भी बनाने की परंपरा है।

ईष्ट देव शबराई की पूजा का पर्व
असम के लोग इस दिन अपने ईष्‍ट देव शबराई का पूजन कर सुख समृद्धि का वरदान मांगते हैं। उन्‍हें तिल के लड्डू अर्पित किए जाते हैं। इसके अलावा किसान अपने जानवरों को भी पूजते हैं और उन्‍हें घर का भोजन खिलाते हैं।

प्रियजनों को गमछा भेंट करना शुभ
बिहु के त्योहार में लोग अपने प्रियजनों को फूल और गमछा भी भेंट करते हैं। नव युवक एक महीने पहले से ही ढोल, पेपा, गगना कि तैयारी करते हैं और नव युवतियां उनकी ताल और सुर पर थिरकती हुई बिहू नृत्य करती हैं।

 

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