पढ़े, ढूंढाड़ की डेढ सो बरस पहले की कानून व्यवस्था

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जयपुर। ढूंढाड़ यानि जयपुर की रियासत के बारें में देश-विदेश में काफी चर्चे फैले हुए है। जयपुर में करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले अपनी अलग रियासतकालीन कानून व्यवस्था थी। महाराजा या सामंत ही सुनवाई के बाद अपराधी को दण्ड देते रहे। वर्ष 1852 में अंग्रेजों ने महाराजा राम सिंह द्वितीय को शासन करने का पूरा अधिकार दिया तब न्यायिक व्यवस्था में थोडा सुधार करने का सिलसिला शुरू हुआ। बड़े मामलों में महाराजा सुनवाई करने के बाद दण्ड सुनाते थे। उस समय दण्ड के रूप में महकमा मुसाहिबात को पांच सौ रुपए तक के जुर्माने का अधिकार था। उस समय रियासत के खेतड़ी सहित सौलह परगनों में न्याय अधिकारी नियुक्त हुए।

जयपुर की रियासत में उन दिनों कस्बों व आस-पास के गांवों में डकैतों का आतंक बढऩे लगा, तब परगनों में 160 घुड़सवार सैनिक, 25 पैदल सैनिक के अलावा 4 हाकम और मुसद्दी तैनात किए गए। इस दौरान मोहतमीम यानी न्यायिक अधिकारी को तीन साल की सजा व दो हजार रुपए तक जुर्माना करने का अधिकार दिया गया। वर्ष 1867 में दीवानी अदालत बनी, उसके बाद अंग्रेजों की न्याय प्रणाली के तहत न्यायायिक प्रक्रिया में बदलाव किये गये। महाराजा की रॉयल काउन्सिल को सर्वोच्च न्यायालय का दर्जा देने व सिविल व अपराधिक मामलों में अपील के लिए अपील महकमा बनाया गया। न्याय व्यवस्था में सिविल न्यायालयों के नीचे मुंसिफ कोर्ट बनायें गये और शहर कोतवाल को छोटे अपराध की जांच का दायित्व सौंपा।

बैठक में दिया जाता था मृत्यु दण्ड
जयपुर की रियासत में 1870 में महाराजा द्वारा न्याय व्यवस्था को दस निजामतें तथा 31 तहसीलों में स्थापित किया। इस दौरान धर्म सभा व काजी से भी धर्मशास्त्रों के तहत राय लेने की व्यवस्था की गई। धर्म सभा में हिन्दू शास्त्र विधि के सात विद्वानों की मौज मंदिर सभा, राज राजेश्वरी मंदिर में सप्ताह में दो बार बैठती थी। कई बार महाराजा भी धर्म सभा से सलाह लेते थे। सवाई माधोसिंह द्वितीय के शासन में रायल काउन्सिल को महकमा आलिया काउन्सिल का दर्जा दिया गया। इसमें महाराजा सहित चार सदस्य का चयन किया गया। महाराजा की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में मृत्यु दण्ड दिया जाता था। इसी में फौजदार को 25 कोड़े मारने का अधिकार दिया गया।

सवाई मानसिंह द्वितीय ने ब्रिटिश भारत की न्याय प्रणाली की तरह अदालत व्यवस्था को किया कायम
सवाई मानसिंह द्वितीय ने ब्रिटिश भारत की न्याय प्रणाली को अदालत व्यवस्था की तरह कायम किया। महकमा आलिया काउन्सिल को दो भागों में बांट कर इसका अध्यक्ष ब्रिटिश रेजीडेंट को बनाया। चीफ कोर्ट में राय बहादुर शीतला प्रसाद वाजपेयी के अलावा मुंशी नानगराम, मुंशी राधा मोहन लाल व कल्याण सिंह खाचरियावास चुने गये थे। 1942 में उच्च न्यायालय अधिनियम पारित किया गया। जिसके तहत चीफ कोर्ट व महाराजा की काउन्सिल के अपीलीय अधिकार उच्च न्यायालय को दिए गए। किसी भी फरियादी द्वारा मृत्यु दण्ड की क्षमा याचना महाराजा के पास ही जाती थी। इस न्यायप्रणाली के प्रथम न्यायाधीश राय बहादुर शीतला प्रसाद वाजपेयी बने। उच्च न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसी आज्ञा का अधिकार जयपुर दण्ड प्रक्रिया की धारा 491 के तहत दिया गया।

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