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जानें क्यों और किसकी याद में मनाया जाता है 'इंजीनियर डे'

  • Mahanagartimes
  • 15 September, 2020

लाइफस्टाइल

नई दिल्ली : महान भारतीय इंजीनियर भारत रत्न सर एम विश्वेश्वरय्या के याद में भारत में हर साल 15 सितंबर को ‘इंजीनियर डे’ मनाया जाता है। एम विश्वेश्वरय्या का जन्म 15 सितंबर 1860 को मैसूर (कर्नाटक) में हुआ था। विश्वेश्वरय्या के प्रयासों से ही कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर का निर्माण हो पाया। उनके प्रयासों के कारण ही मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1955 में उन्हें सर्वोच्च भारतीय सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इंजीनियर्स को ही मानव जीवन में रचनात्मक बदलाव का श्रेय जाता है।

सर एम विश्वेश्वरय्या के जीवन से जुड़ी खास बातें

शुरुआती पढ़ाई मैसूर में करने के बाद उन्होंने बेंगलुरु में 'सेंट्रल कॉलेज' में दाखिला लिया लेकिन उनके पास कॉलेज में देने के लिए फीस नहीं थी जिसके बाद उन्होंने ट्यूशन लेना शुरू किया और अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 1881 में बीए की पढ़ाई के बाद स्थानीय सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के 'साइंस कॉलेज' में दाखिला लिया. 1883 की एल.सी.ई. व एफ.सी.ई. (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया। उनकी योग्यता को देखते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया। जिस समय उन्होंने इंजीनियरिंग में अपने करियर की शुरुआत की, तब भारत में ब्रिटिश शासन था।

National Engineers Day 2020: जानें क्यों और किसकी याद में मनाया जाता है यह दिन

विश्वेश्वरैया ने अपनी योग्यता से बड़े बड़े अंग्रेज़ इंजीनियरों को अपनी योग्यता और प्रतिभा का लोहा मनवाया। प्राकृतिक जल स्रोत्रों से घर-घर में पानी पहुंचाने की व्यवस्था और गंदे पानी की निकासी के लिए नाली-नालों की समुचित व्यवस्था उन्होंने ही की। 1932 में 'कृष्ण राजा सागर' बांध के निर्माण परियोजना में वो चीफ इंजीनियर की भूमिका में थे। 'कृष्ण राज सागर' बांध का निर्माण आसान नहीं था क्योंकि तब देश में सीमेंट तैयार नहीं होता था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और इंजीनियर्स के साथ मिलकर 'मोर्टार' तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। उन्होंने बांध बनवाया और आज भी यह बांध कर्नाटक में मौजूद है। यह बांध उस समय का एशिया का सबसे बड़ा बांध कहा जाता था। इस बांध से कावेरी, हेमावती और लक्ष्मण तीर्थ नदियां आपस में मिलती है। 1955 में विश्वेश्वरैया को सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।

अन्य क्षेत्रों में भी दिया महत्वपूर्ण योगदान

सिर्फ इंजीनियरिंग फील्ड में ही नहीं मोक्षागुंडम कई फील्ड में अपनी पहचान बना चुके हैं लेकिन शिक्षा और इंजीनियरिंग सबसे खास रहा। वो गरीबी और बेरोजगारी को लेकर अक्सर चिंतित रहते थे और इसके के फलस्वरूप उन्होंने अपने कार्यकाल में 4500 से बढ़ाकर 10,500 कर दी थी। साथ ही कई कृषि, इंजीनियरिंग और औद्योगिक कॉलेज भी खुलवाए जिससे देश का हर बच्चा अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें। मोक्षागुंडम को लोग दक्षिणी बेंगलुरु में स्थित जयानगर इलाके का डिज़ाइन और उसकी योजना बनाने के लिए जानते हैं। एशिया के बेस्ट प्लानड लेयआउट्स में एक जयानगर है जिसका डिज़ाइन मोक्षागुंडम ने ही तैयार किया था।