- भारतीय विद्या भवन विद्याश्रम, प्रतापनगर का 17वां वार्षिकोत्सव ‘शौर्यगाथा’ बना वीरता, पराक्रम और राष्ट्रगौरव का भव्य उत्सव

जयपुर। इतिहास जब मंच पर उतरता है और नन्हे कलाकारों के अभिनय में वीरता, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम की हुंकार गूंजती है, तो हर दृश्य यादगार बन जाता है। कुछ ऐसा ही नजारा भारतीय विद्या भवन विद्याश्रम, प्रतापनगर के 17वें वार्षिकोत्सव ‘शौर्यगाथा’ में देखने को मिला। महान योद्धा सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन, संघर्ष और अदम्य साहस पर आधारित इस भव्य सांस्कृतिक आयोजन में विद्यार्थियों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों से इतिहास के गौरवशाली पन्नों को जीवंत कर दिया। कार्यक्रम की शुरुआत भारतीय परंपरा और अनुशासन के अनूठे संगम के साथ हुई। बैंड की जोशीली धुनों के बीच एनसीसी कैडेट्स ने शानदार मार्च-पास्ट कर मुख्य अतिथि का स्वागत किया। वैदिक मंत्रोच्चार एवं स्वस्तिवाचन के बाद मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) प्रवीण चंद्र त्रिवेदी ने दीप प्रज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया। प्रो. त्रिवेदी जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर एवं दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल शैक्षणिक उपलब्धियां हासिल करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में अनुशासन, परिश्रम और मजबूत चरित्र का निर्माण करना भी है। उन्होंने विद्यार्थियों को लक्ष्य निर्धारित कर दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ने तथा महान वीरों के जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश दिया।
शिव वंदना से घूमर तक, राजस्थानी संस्कृति के रंगों ने मोहा मन

समारोह में प्राचार्या ने विद्यालय का वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए शैक्षणिक, खेलकूद, सहशैक्षिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों का ब्यौरा दिया। इसके बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ। नन्हे विद्यार्थियों की भावपूर्ण शिव वंदना ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। वहीं, ‘आयो रे शुभ दिन आयो’ गीत पर पृथ्वीराज चौहान के जन्मोत्सव का मनोहारी मंचन हुआ। खली की दमदार धुन पर गौरी के प्रवेश की प्रस्तुति ने दर्शकों में उत्साह भर दिया। इसके बाद घूमर और ‘अलबेलो सजन आयो री’ जैसी प्रस्तुतियों में छात्राओं ने राजस्थानी पारंपरिक वेशभूषा, आकर्षक नृत्य और मनमोहक भाव-भंगिमाओं से राजस्थान की आन-बान-शान का शानदार प्रदर्शन किया।
पृथ्वीराज-गौरी के युद्ध का मंचन बना सबसे बड़ा आकर्षण

‘शौर्यगाथा’ का सबसे प्रभावशाली पक्ष पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर आधारित नाट्य प्रस्तुति रही। विद्यार्थियों ने नृत्य, अभिनय, संगीत और काव्यात्मक संवादों के माध्यम से पृथ्वीराज के जीवन के प्रमुख प्रसंगों, संयोगिता प्रसंग, राजपूती स्वाभिमान और राजनीतिक संघर्षों को मंच पर उतारा।
पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच युद्ध का दृश्य दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण बना। युद्धभूमि का वातावरण, सैनिकों की गतिविधियां, तलवारों की टकराहट और कलाकारों का सधा हुआ अभिनय देखकर ऐसा लगा मानो इतिहास का वह दौर आंखों के सामने साकार हो उठा हो। विद्यार्थियों के बेहतरीन तालमेल, अनुशासन और मेहनत ने इस प्रस्तुति को यादगार बना दिया।
शब्दभेदी बाण के दृश्य ने किया रोमांचित, मित्रता और स्वाभिमान का दिया संदेश
कार्यक्रम का चरमोत्कर्ष चंद्रवरदाई रचित ‘पृथ्वीराज रासो’ की प्रसिद्ध शब्दभेदी बाण की कथा पर आधारित अंतिम दृश्य रहा। गौरी के दरबार में बंदी पृथ्वीराज चौहान और उनके परम मित्र एवं कवि चंद्रवरदाई के प्रसंग को प्रभावशाली संवादों और काव्यात्मक अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया गया। चंद्रवरदाई के संकेतात्मक दोहे और पृथ्वीराज द्वारा शब्दभेदी बाण चलाने के दृश्य ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया।
इस प्रस्तुति में विद्यार्थियों ने मित्रता, वीरता, आत्मसम्मान और अदम्य साहस की भावना को प्रभावशाली तरीके से अभिव्यक्त किया। पूरे आयोजन में यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि वीरता केवल युद्धभूमि में शस्त्र उठाने तक सीमित नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, मूल्यों और स्वाभिमान की रक्षा करने में भी निहित है।
इतिहास को किताबों से निकालकर मंच पर उतारा
‘शौर्यगाथा’ की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि विद्यार्थियों ने इतिहास को केवल घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि नृत्य, संगीत, कविता, संवाद और जीवंत अभिनय के जरिए प्रस्तुत किया। इस आयोजन ने नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने के साथ राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक चेतना और आत्मसम्मान का संदेश भी दिया।
समारोह के अंत में विद्यालय की उपप्रधानाचार्या ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, विद्यालय प्रबंधन, अभिभावकों, शिक्षकगण, आयोजन समिति और सभी सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। साथ ही, आयोजन को सफल बनाने में विद्यार्थियों, शिक्षकों और पर्दे के पीछे जुटी पूरी टीम के योगदान की सराहना की।
कुल मिलाकर, भारतीय विद्या भवन विद्याश्रम का 17वां वार्षिकोत्सव केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और राष्ट्रगौरव का ऐसा जीवंत उत्सव बना, जिसमें विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा से साबित कर दिया कि वीरता की विरासत आज भी नई पीढ़ी के दिलों में पूरी शान से जिंदा है।
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